माघ शुक्ल सप्तमी (अचला/रथ सप्तमी)

25 जनवरी 2026 (रविवार) को माघ शुक्ल सप्तमी है।

माघ शुक्ल सप्तमी को अचला सप्तमी, रथ सप्तमी, आरोग्य सप्तमी, भानु सप्तमी, अर्क सप्तमी आदि अनेक नामों से जाना जाता है। यह दिन भगवान सूर्य की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन पुत्र-प्राप्ति, पुत्र-रक्षा एवं पुत्र-अभ्युदय हेतु संतान सप्तमी व्रत भी किया जाता है।

स्कन्द पुराण के अनुसार

यस्यां तिथौ रथं पूर्वं प्राप देवो दिवाकरः॥
सा तिथिः कथिता विप्रैर्माघे या रथसप्तमी॥ ५.१२९ ॥
तस्यां दत्तं हुतं चेष्टं सर्वमेवाक्षयं मतम्॥
सर्वदारिद्र्यशमनं भास्करप्रीतये मतम्॥ ५.१३० ॥

जिस तिथि को भगवान सूर्य पहली बार रथ पर आरूढ़ हुए, वह माघ मास की सप्तमी कहलाती है, जिसे रथसप्तमी कहते हैं। इस दिन किया गया दान, यज्ञ और पुण्यकर्म अक्षय फलदायी माना गया है। यह दरिद्रता का नाश करने वाला तथा सूर्यदेव की प्रसन्नता प्राप्त करने वाला पर्व है।

भविष्य पुराण के अनुसार

सप्तमी तिथि को भगवान सूर्य का आविर्भाव हुआ था। वे अंड के साथ उत्पन्न हुए तथा उसी में रहते हुए वृद्धि प्राप्त की। लंबे समय तक अंड में रहने के कारण वे मार्तण्ड’ नाम से प्रसिद्ध हुए।

भविष्य पुराण में यह भी वर्णित है कि सप्तमी तिथि के दिन ही सूर्यदेव को अपनी भार्या प्राप्त हुई, उन्हें दिव्य रूप मिला तथा संतान-प्राप्ति भी इसी तिथि को हुई—इसलिए सप्तमी तिथि सूर्यदेव को अत्यंत प्रिय है।

भविष्य पुराण : श्रीकृष्ण उवाच

शुक्लपक्षे तु सप्तम्यां यदादित्यदिनं भवेत्।
सप्तमी विजया नाम तत्र दत्तं महाफलम्॥
स्नानं दानं जपो होम उपवासस्तथैव च।
सर्वे विजयसप्तम्यां महापातकनाशनम्॥
प्रदक्षिणां यः कुरुते फलैः पुष्पैर्दिवाकरम्।
स सर्वगुणसंपन्नं पुत्रं प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन! शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि यदि रविवार को पड़े, तो उसे विजया सप्तमी कहा जाता है। यह महापातकों का नाश करने वाली है। इस दिन स्नान, दान, जप, होम एवं उपवास करने से अनन्त पुण्यफल प्राप्त होता है। जो भक्त फल-पुष्प आदि लेकर सूर्यदेव की प्रदक्षिणा करता है, उसे सर्वगुण-संपन्न उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है।

नारद पुराण के अनुसार

माघ शुक्ल सप्तमी को अचला व्रत” कहा गया है। यह त्रिलोचन जयंती” भी मानी जाती है। इसी दिन को रथसप्तमी/भास्कर सप्तमी भी कहते हैं, जिसका पुण्य करोड़ों सूर्यग्रहणों के समान बताया गया है।

इस दिन अरुणोदय के समय स्नान करने का विशेष महत्व है। स्नान के समय आक और बेर के सात-सात पत्ते सिर पर रखकर स्नान करना चाहिए, जिससे सात जन्मों के पापों का नाश होता है।

इसी सप्तमी को पुत्रदायक व्रत” भी कहा गया है। सूर्यदेव ने कहा है—
जो माघ शुक्ल सप्तमी को विधिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, मैं अत्यंत प्रसन्न होकर अपने अंश से उसका पुत्र बनूंगा।”

इसलिए इस दिन इन्द्रिय-संयम रखते हुए दिन-रात उपवास, अगले दिन होम, तथा ब्राह्मणों को दही, भात, दूध, खीर आदि का भोजन कराने का विधान बताया गया है।

अग्नि पुराण के अनुसार

अग्निदेव कहते हैं—माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को अष्टदल या द्वादशदल कमल बनाकर उसमें भगवान सूर्य का पूजन करना चाहिए। इससे मनुष्य शोक-रहित हो जाता है।

चंद्रिका में लिखा है

सूर्यग्रहणतुल्या हि शुक्ला माघस्य सप्तमी।
अरुणोदयवेलायां तस्यां स्नानं महाफलम्॥”

अर्थात माघ शुक्ल सप्तमी सूर्यग्रहण के तुल्य होती है और सूर्योदय के समय स्नान करने से महान फल प्राप्त होता है।

नारद पुराण के अनुसार

अरुणोदयवेलायां शुक्ला माघस्य सप्तमी।
प्रयागे यदि लभ्येत सहस्रार्कग्रहैः समा॥
अयने कोटिपुण्यं स्याल्लक्षं तु विषुवे फलम्॥”

चंद्रिका में विष्णु-वचन

अरुणोदयवेलायां शुक्ला माघस्य सप्तमी।
प्रयागे यदि लभ्येत कोटिसूर्यग्रहैः समा॥”

अर्थात यदि माघ शुक्ल सप्तमी अरुणोदय के समय प्रयाग में प्राप्त हो जाए, तो यह कोटि सूर्यग्रहणों के समान पुण्यदायी होती है।

मदनरत्न (भविष्योत्तर पुराण)

माघे मासि सिते पक्षे सप्तमी कोटिभास्करा।
दद्यात् स्नानार्घदानाभ्यामायुरारोग्यसम्पदः॥”

अर्थात माघ मास की शुक्ल सप्तमी कोटि सूर्यों के समान है। इस दिन सूर्य-स्नान, अर्घ्यदान एवं दान से आयु, आरोग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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