पंचमुखी (Panchmukhi Hanuman) क्यों हुए हनुमान?

लंका युद्ध में मेघनाद के वध के बाद रावण अत्यंत चिंतित हुआ। उसकी माता कैकसी ने उसे पाताल लोक में रहने वाले मायावी भाइयों—अहिरावण और महिरावण—की याद दिलाई। ये दोनों तंत्र-मंत्र के महान ज्ञाता और देवी कामाक्षी के भक्त थे। रावण ने उन्हें राम और लक्ष्मण के वध के लिए बुलाया।
विभीषण को इस षड्यंत्र का आभास हो गया और उन्होंने सुरक्षा कड़ी कर दी। फिर भी महिरावण, विभीषण का रूप धरकर राम और लक्ष्मण को सोते समय उठाकर पाताल लोक ले गया, जहाँ उनकी बलि देने की तैयारी थी।
जब यह समाचार हनुमान जी को मिला, तो वे पाताल पहुँचे। वहाँ द्वार पर उनका सामना मकरध्वज से हुआ, जो स्वयं को हनुमान का पुत्र बताता है। युद्ध के बाद सच्चाई ज्ञात होने पर मकरध्वज ने उनकी सहायता की।
हनुमान जी ने देवी कामाक्षी से प्रार्थना की। देवी ने बताया कि अहिरावण-महिरावण की मृत्यु तभी संभव है जब मंदिर में जल रहे पाँच दीपक एक साथ बुझाए जाएँ। साथ ही, उनके पुनर्जीवन का रहस्य उन भँवरों (भ्रमरों) में था जो अमृत की बूंद उनके मुख में डाल देते थे।
हनुमान जी ने पहले उन भ्रमरों का अंत किया। फिर पाँचों दीपकों को एक साथ बुझाने के लिए उन्होंने पंचमुखी रूप धारण किया—
- पूर्व में हनुमान मुख
- दक्षिण में नरसिंह मुख
- पश्चिम में गरुड़ मुख
- उत्तर में वराह मुख
- ऊपर की ओर हयग्रीव मुख
इन पाँचों मुखों से एक साथ फूँक मारकर उन्होंने पाँचों दीप बुझा दिए। उसी क्षण अहिरावण और महिरावण की माया समाप्त हो गई और वे मारे गए।
इसके बाद हनुमान जी ने राम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और सब सुरक्षित लौट आए।
सार
हनुमान जी का पंचमुखी रूप धारण करना केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं था, बल्कि रणनीति, भक्ति और बुद्धिमत्ता का अद्भुत संगम था। पाँचों दीपकों को एक साथ बुझाने के लिए ही उन्हें पंचमुखी बनना पड़ा, जिससे अधर्म का अंत संभव हो सका।
यह कथा हनुमान जी की असीम शक्ति, समर्पण और चतुराई का प्रतीक है।
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