माघ पूर्णिमा विशेष : जानिए इस पावन दिन के बारें में

माघी पूर्णिमा (maagh poornima)
ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है । इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान करने का विशेष फल है । माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपडे, कम्बल, रत्न, पगडी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में सुखी होता है । ‘मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है । (मत्स्यपुराण ५३ । ३५)
विशेष – 01 फरवरी 2026 रविवार को माघी पूर्णिमा है।
दिन – रविवार
विक्रम संवत 2082
शक संवत -1947
अयन – उत्तरायण
ऋतु – शिशिर ॠतु
मास – माघ
पक्ष – शुक्ल
तिथि – पूर्णिमा 02 फरवरी रात्रि 03:38 तक तत्पश्चात प्रतिपदा
नक्षत्र – पुष्य सुबह 11:58 तक तत्पश्चात अश्लेशा
योग – प्रीति सुबह 10:19 तक तत्पश्चात आयुष्मान
राहुकाल – शाम 05:05 से शाम 06:29 तक
सूर्योदय – 07:17
सूर्यास्त – 06:27
दिशाशूल – पश्चिम दिशा मे
व्रत पर्व विवरण- व्रत पूर्णिमा, माघी पूर्णिमा,माघ स्नान समाप्त, रविपुष्य योग (सूर्योदय से रात्रि 11:58 तक)
विशेष – चतुर्दशी व पूर्णिमा एवं व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)
पुष्य नक्षत्र योग
01 फरवरी 2026 रविवार को सूर्योदय से रात्रि 11:58 तक रविपुष्य अमृत योग है ।
108 मोती की माला लेकर जो गुरुमंत्र का जप करता है, श्रद्धापूर्वक तो २७ नक्षत्र के देवता उस पर खुश होते हैं और नक्षत्रों में मुख्य है पुष्य नक्षत्र, और पुष्य नक्षत्र के स्वामी हैं देवगुरु ब्रहस्पति | पुष्य नक्षत्र समृद्धि देनेवाला है, सम्पति बढ़ानेवाला है | उस दिन ब्रहस्पति का पूजन करना चाहिये | ब्रहस्पति को तो हमने देखा नहीं तो सद्गुरु को ही देखकर उनका पूजन करें और मन ही मन ये मंत्र बोले –
ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |…… ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |
रविपुष्यामृत योग
‘शिव पुराण’ में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है | पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्त और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं | ‘सर्वसिद्धिकर: पुष्य: |’ इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है | पुष्य नक्षत्र में किये गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है |
इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं | (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)
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